Skip to main content

मधुरतम काव्य








मधुरतम काव्य
साधना कि भूमिपर
बसंती हवा से
हर्श-विशादकी देह पर
लिखाजाता है,
कोमल विचारशैय्या से
ह्रदय की गहराईपर
अभिनन्दनकरता
यौवनबरसाता है,
भवन और भवनोंकी
कतारों परलिखे लेख
गुफाओं कीदेह को उकेरते कर्कश तीर
जीवन की लय ताल को
स्याहीमें भिगाता है,
पर्वतों कीचाँदनी,
सागर की शान्ति,
पपीहे की धुन,
और गीतों के कणोंको
अधरोंपर सजाता है,
गौरैया कानीड़,
नई नवेली काघूँघट,
कैन्वस काआखिरी रंग,
और कल्पना कीआखिरी पंक्ति को
नयी दुनिया दिखाता है,
प्रकृति केउजले रंग में
गुलदस्तोंसदृश
बंद पलकों केचित्र
सांसों कीआवृत्ति बन
रात्रि कादीपक
दिन का सूरजबन जाता है।



Comments

  1. apne bahut achchha likha hai,kafi sunder kavita hai,kavita ka akhiri panktiyan bahut sunder hain. Thanks alot for that.

    ReplyDelete
  2. सुन्दर कविता के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

    ReplyDelete
  3. Good imagination.Thanks for this poetry especially last stanza.

    ReplyDelete
  4. कविता की आखिरी लाइनें अच्छी हैं,सुन्दर,परन्तु ये बतायें कि कानून पर आपको क्या लिखना है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

दोषसिद्ध

आज खुलीं आँखें गर्वीलीं
आज खुलीं आँखें गर्वीलीं
काली पट्टी की देवी के हाथों में देखो
समय ने मधु मदिरा पीली
आज खुलीं------
सोच रहा मानस बेचारा
इन रहस्यमयी कर के बिन्दू पर
कहाँ गये वे धन के प्याले
मान प्रतिष्ठा के रखवाले
दिया कटोरा इन हाथों में
फूलों की भी साँसें गीली,
आज खुलीं-----
वे हाथ बँधे प्रतिनिधि के आगे
जो झुके कभी न काँधों से नीचे
कैसा खेल खिलाया प्रभु ने
पराधीनता के जीवन में
झुक गया मान घुटनों के नीचे
पड़ी देह प्रिया की पीली
आज खुलीं----
मन ही मन घुटता दम
मात-पिता का छूटा दामन
मुझ जैसे ही उर के छाले
मानवता के विषधर काले
जो तनकर खड़े थे खड़े कभी
चोटों से रीढ़ पड़ी है नीली
आज खुलीं-----
जो झूठ बोलता था  दर्पण
आज कर रहा मौन समर्पण
मानवता के प्रतिनिधि की वाणी
अलग हुआ दूध और पानी
उस ममता का तृप्त हुआ मन
जो बिन बेटे के ही जी ली
आज खुलीं-------

स्वामी विवेकानन्द के विचार

उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये।जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा  में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम…