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संघर्ष












स्वयं मिलेगीराह तुझे
जीवन के संघर्षोंमें,
कुछफूल-शूलके हार मिलेंगे
कुछविश्वास मिलेगा वर्षों में,
सुख दुख काआगम शाश्वत नहीं है पृथ्वीपर
जब भेद समयका जान गया
तो शोकाकुल क्यों नियति पर
जब कर में तेरेहै करनी का निस्सीम बल
बन न लता वृक्षबन
करप्रदान निज को संबल ,
निज जीवन जीतेहैं सब ही
कुछ औरों कोहो तो कुछ बात बने
बूंद-बूंदसा अमृत सबको
फिर कोई बरसातबने
कुछ करने कोमन में भाव सभी उछल पड़े
जब सुप्त से सजगहुई आत्मा
नीड़ से पक्षीनिकल उड़े ।



Comments

  1. जीवन में हर पल संघर्ष है,कोई प्राणी इससे अछूता नहीं है।
    "Struggle thy mane is Life"

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  2. आपकी रचना ने न्यायपालिका पर आम जनता के अटूट विश्वास को उजागर किया है, वास्तविकता भी यही है कि आजकल जिस तरह अपराधों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है लोगों की एक मात्र उम्मीद न्यायपालिका ही है। अच्छी कविता के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

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दोषसिद्ध

आज खुलीं आँखें गर्वीलीं
आज खुलीं आँखें गर्वीलीं
काली पट्टी की देवी के हाथों में देखो
समय ने मधु मदिरा पीली
आज खुलीं------
सोच रहा मानस बेचारा
इन रहस्यमयी कर के बिन्दू पर
कहाँ गये वे धन के प्याले
मान प्रतिष्ठा के रखवाले
दिया कटोरा इन हाथों में
फूलों की भी साँसें गीली,
आज खुलीं-----
वे हाथ बँधे प्रतिनिधि के आगे
जो झुके कभी न काँधों से नीचे
कैसा खेल खिलाया प्रभु ने
पराधीनता के जीवन में
झुक गया मान घुटनों के नीचे
पड़ी देह प्रिया की पीली
आज खुलीं----
मन ही मन घुटता दम
मात-पिता का छूटा दामन
मुझ जैसे ही उर के छाले
मानवता के विषधर काले
जो तनकर खड़े थे खड़े कभी
चोटों से रीढ़ पड़ी है नीली
आज खुलीं-----
जो झूठ बोलता था  दर्पण
आज कर रहा मौन समर्पण
मानवता के प्रतिनिधि की वाणी
अलग हुआ दूध और पानी
उस ममता का तृप्त हुआ मन
जो बिन बेटे के ही जी ली
आज खुलीं-------

स्वामी विवेकानन्द के विचार

उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये।जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा  में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैं–इस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो।ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम…